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Tuesday, April 12, 2022

Hanuman Jayanti 2022: हृदय में हों हनुमान तो होगा सब शुभ




रेवांचल टाइम्स:जीवन में सभी मंगल चाहते हैं। शुभ की कामना करते हैं। बजरंगबली को हम मंगलकारी के रूप में स्मरण करते हैं। उन्होंने सदैव श्रीराम के लिए और मानव जाति के लिए मंगल कार्य किए। हर अमंगल को खुद को झेला, अशुभ को शुभ में बदला। जीवन भर उन्होंने लोगों के लिए मंगल दिए। चाहे वह सुग्रीव हों, रावण हों या और कोई। रावण को अशुभ की चेतावनी और मंगल का रास्ता दिखाने का कार्य भी पवनसुत हनुमान ने किया था। यही उनकी विशेषता है। यही कारण है कि उनको मंगल के दिन स्मरण किया जाता है- ‘पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।’ अर्थात् आप सभी संकट को हरने वाले मंगल के साक्षात स्वरूप हैं। इसकी कामना की शुरुआत हम ‘श्री गुरु चरन सरोज रज...’ से करते हैं।’

हनुमान चालीसा में कहा गया है कि हमारे पास कम बुद्धि है, शक्ति कम है। लेकिन हमारे पास हनुमान हैं। हम उनकी स्तुति करते हैं, उनको याद करते हैं, ताकि हमको वे बुद्धिहीन जानकर बल, बुद्धि और विद्या के साथ धन एवं यश के भागी बनाएं। हनुमान एक प्रेरणा हैं। जब भी मन में दुख हो, परेशानी हो, उनको याद कीजिए। एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो जाता है। खुद श्री हनुमान ने अपनी शक्ति को जब जाना, तभी वह लंका जा सके। उसी प्रकार हम भी अपने लक्ष्य तक पहुंचें, इसकेलिए हनुमान की पूजा जरूरी है। बजरंगबली का हमारे जीवन में सहारा हो जाए, तो हम हरेक लड़ाई जीत जाएंगे।

मंगल यानी शुभ दिन। कष्ट में मंगल के लिए श्री हनुमान का ध्यान करना चाहिए। एक संवेदनशील व्यक्ति, एक आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए हनुमान ही इष्टदेव होने चाहिए। जब भी भय एवं परेशानी की बात हो- हनुमान का ध्यान करना चाहिए। आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए हनुमान ही आश्रय हैं।

यह मंगलाचरण जीवन को साधने का सर्वश्रेष्ठ मंत्र या दोहा है। प्रारम्भ करते हैं इस प्रार्थना के साथ- ‘हे हनुमानजी! चरण रज से मन को निर्मल कर दो।’

पूरे मंगलाचरण के दौरान अपने को निर्मल करने, सुधारने, सीखने और समर्पण करने की बात की जाती है। बार-बार यह दोहराया जाता है कि हम सही मार्ग पर चलें। और अंत में- ‘अब मन निर्मल हो गया। आओ हे हनुमानजी! मेरे हृदय में विराजमान हो।’- यह प्रतीक है। कहने का तात्पर्य यह कि जब तक मन निर्मल नहीं होगा, सधेगा नहीं, अंतर्चेतना में हम स्थापित नहीं होंगे। तब तक हमारे कर्म की, धर्म की दिशा सही नहीं होगी।

आखिर हृदय से ही स्वभाव बनता है और मस्तिष्क से व्यवहार। बाहरी संसार का संचालन मनुष्य का व्यवहार करता है और भीतर के संसार का संचालन हमारा स्वभाव करता है। यहां यह भी स्मरण रखना जरूरी है कि कई लोग अपने व्यवहार से स्वभाव को साधते हैं, तो कई स्वभाव से अपने व्यवहार को साधते हैं। स्वाभाविक है, जो लोग अपने व्यवहार से संचालित होंगे, वे कई कार्य स्वार्थ प्रेरित होकर करेंगे। वहीं, जो व्यक्ति स्वभाव से संचालित होंगे, वह सदैव दूसरों का मंगल करेंगे। सर्वप्रिय बनेंगे और जीवन को दिशा देंगे।

कोई दूसरे के लिए मंगल तभी करेगा, जब उसके अंदर शुभ का संस्कार हो। शुभ का संस्कार नहीं होगा, तो व्यवहार भी मंगलकारी नहीं होगा।

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