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Monday, January 17, 2022

भारतीय समाज का आर्थिक सामाजिक राजनीतिक और शैक्षणिक विकास संभव नहीं....?करन शाह उईके..........

 




रेवांचल टाईम्स -  करन शाह कहते हैं, विधि, आजादी, समानता और बंधुत्वा वाले समतामूलक समाज की स्थापना किए बिना भारतीय समाज का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक विकास संभव नही है।

सिवनी जिले के आदिवासी क्षेत्र लखनादौन से आम आदमी पार्टी के प्रभारी और समाजिक कार्यकर्ता करन शाह उइके ने पूर्व के समाजिक दृष्टिकोण के अनुरूप आज का समाज कैसा हो पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहते हैं। जैसा की आप सभी जानते हैं, भारत में आदिवासियों की एक बहुत बड़ी संख्या है, जो मानव समाज से अलग असभ्य और जंगली हालत में जीवन जीने पर मजबूर हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो विवश होकर जरायमपेशा हो गए हैं। हिंदु डींगे मारते हैं की उनके वेद में समूचे विश्व को आर्य बनाने का आदेश है, तो फिर अपने ही देश में रहने वाले आदिवासियों को उन्होंने अब तक सभ्य आर्य क्यों नही बनाया? 

क्या यह शर्म की बात नही है? हिन्दुओं ने आदिवासियों को सभ्य बनाने का प्रयास क्यों नहीं किया इसका सही जवाब यह है की हिंदु वर्ण और जाति के अहंकार से ग्रसित है, इसलिए वह आदिवासियों से संपर्क स्थापित नही कर सकते।


आदिवासियों को सभ्य बनाने में उसे आदिवासियों के साथ बसना, प्रेम व सहानुभूति पैदा करना एवं आदिवासियों को अपनाना पड़ता। यह सब उनके लिए संभव नही था, क्योंकि ऐसा करने से हिन्दुओं में वर्ण और जाति की पवित्रता नष्ट हो जाती। 

इसलिए वह आदिवासियों से दूर रहा, हिन्दुओं को यह कल्पना नही हो पाई की यदी हिन्दुओं ने इन जातियों को सुधार कर इन्हें अपने धर्म का साझीदार बना लिया, तो ये बहुसंख्यक आदिवासी उनके दुश्मनों की संख्या बढ़ा देंगे और तब हिंदुओं को अपने जाति भेद और वर्ण भेद को ही धन्यवाद देना पड़ेगा।

केवल यही नही की हिंदुओं ने आदिवासियों को सभ्य बनाने का यत्न नही किया, ऊंचे वर्ण वाले हिंदुओं ने अपने से नीचे वर्ण वालों के सांस्कृतिक विकास को रोका है। महाराष्ट्र के सुनारों और पठारे प्रभुओं के साथ बलपूर्वक ऐसा किया गया, बेचारे सुनारों को शौक हुआ की वे भी ब्राह्मणों की तरह वुनी धोती और त्रिपुण्ड धारण कर परस्पर नमस्कार किया करें, तो उन्हें पेशवाओं ने दबाव डाल कर ऐसा करने से रोक दिया और पठारे प्रभु जब ब्राह्मणों की नकल कर विधवाओं को बिठलाने लगे क्योंकि विधवा विवाह अनार्य प्रथा है, आर्य हिन्दुओं में विधवा विवाह नही होता, तो कानूनन रोका गया। बाबा साहब कहते थे की हिंदु लोग मुसलमानों और ईसाइयों की हमेशा निंदा करते हैं, क्योंकि यह दोनों धर्म मानवता के अधिक निकट पाए जाते हैं। ये गिरे हुए को उठाते और ज्ञान का प्रकाश फैलाकर लोगों के विकास का मार्ग खोलते हैं।

जबकि हिंदुओं का जातीय राग-द्वेष दुर्बलों को हमेशा अज्ञानांधकार में रख कर उन्हें सेवकता का सबक सिखाने और उन्हें दलित व पीड़ित प्रवंचित या शोषित करने में ही अपना परम पुरूषार्थ समझता है।

वर्णवाद और जातिवाद ने इस देश में मानवीय सदाचार का भी नरसंहार कर किया है, जो अत्यंत खेदजनक है। मानवीय सदाचार का मतलब है। सर्वाधिक सद्गुण और सर्वाधिक सदाचार, मनुष्यों के केवल दो विभाग किए जा सकते हैं, अच्छे और बुरे, ज्ञानी और अज्ञानी, धर्मात्मा और धर्म हीन, विद्वान और मुर्ख किंतु वर्ण और जाति की भावना ने हिंदुओं की दृष्टि को ऐसा संकुचित बना दिया है कि अन्य मनुष्य कितना ही सद्गुणी और सदाचारी क्यों ना हो, यदी वह किसी वर्ग-विशेष या जाति-विषेश का व्यक्ति नहीं है तो उसकी कोई सुनेगा ही नही। एक ब्राह्मण किसी अब्राह्मण को अपना नेता और गुरू नही मानेगा।

इसी तरह कायस्थ कायस्थ को और बनिया बनिए को ही अपना नेता मानेगा। वर्ण और जाति का विचार छोड़कर मनुष्यों के सद्गुणों की कद्र वह तभी करेगा, जब वह व्यक्ति उसका जाति भाई हो। वहां मानवीय सदाचार कबायली सदाचार बन गया है। सद्गुण-सदाचार की प्रधानता नही है,। वर्ण और जाति की प्रधानता है।

करन शाह ने डॉ. बाबा साहब अंबेडकर जी को कोड करते हुए कहा कि आप पूछ सकते हैं, यदि आप वर्ण और जाति नही चाहते तो आपका आदर्श समाज क्या है?

में कहूंगा एक ऐसा समाज, जिसमें न्याय, भाईचारा, समानता और आजादी हो। में समझता हूँ किसी भी विचारवान को इससे इंकार नही होना चाहिए। भाईचारे का मतलब है की देश में उत्पन्न सभी मनुष्य भाई-भाई हैं, और सभी के पिता की संपत्ति की भाँति देश की संपित्त पर समान अधिकार है। जीवन के लिए आवश्यक रोज़ी-रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी के लिए सभी बराबर के हकदार हैं। इसी का नाम भाईचारा या बंधुता है। इसका दूसरा नाम है लोकतंत्र।

समानता शब्द पर फ्रांसीसी राज्य क्रांति के समय बेहद विवाद हुआ,  क्योंकि सभी मनुष्य समान नही होते। कोई प्रतिभाशाली है, तो कोई जड़-बुद्धि, कोई कलाकार है तो कोई लंठ, कोई बलिष्ठ है तो कोई दुर्बल, कोई वीर है तो कोई भीरू, कोई पुरुषार्थी है तो कोई आलसी, कोई कर्मनिष्ठ है तो आरामतलब, कोई सर्वांग सुंदर है तो कोई कुरूप इत्यादी। 

प्राकृतिक असमानता के कारण व्यवहार में असमानता न्यायसंगत है। किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को उसके अंदर निहित शक्ति के पूर्ण विकास में समान भाव से प्रोत्साहन और सुविधा मिलना आवश्यक है।

इसमें जाति, वंश खानदान, पारिवारिक ख्याति, समाजिक संबंध इत्यादि बाधक नही होनी चाहिए।  जनतंत्र में वोट सबके समान होते हैं, वोटों का वर्गीकरण नही होता। अत: सभी के विकास के अधिकार और व्यवहार में भी समानता होना अनिवार्यत: आवश्यक है।

आजादी समय की मांग और युग-धर्म है। जैसे उठने बैठने, चलने फिरने, हिलने डुलने, सोने जागने की आजादी सभी को प्राप्त है, उसी तरह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार व्यवसाय चुनने और आचरण करने की आजादी होनी चाहिए।

दूसरों की इच्छानुसार जीविका अर्जन करने और अपने जीवन का कर्तव्य स्थिर करने की विवशता होना तो दासता है। वर्ण विधान मतलब कल्पित वर्णों के अनुसार कर्मों की व्यवस्था तो एक वैज्ञानिक दास प्रथा मात्र है।

खान-पान, रहन-सहन, धर्माचरण, चिंतन-मनन, लेखन मुद्रण इत्यादि की आजादी सभी को होना चाहिए। 

इस प्रकार न्याय, भाईचारा, समानता और आजादी से युक्त समाज ही मेरा आदर्श समाज है।


अखिल बन्देवार के साथ रेवांचल टाईम्स की एक रिपोर्ट

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