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Sunday, November 14, 2021

बाल-दिवस पर स्पेशल कविता....चांद ने जब देखा धरती पर, बच्चों को खेलता लुकन-छुपाई ....



 (इस कविता में खेल भी है, समझदारी भी है और सेहत भी है)    

शीर्षक : "खेल खेल में"

      सलोनी चावला 


रेवांचल टाईम्स - चांद ने जब देखा धरती पर,

बच्चों को खेलता लुकन-छुपाई;

सोच में डूबा, बोला खुद से, 

"मैं किसके संग खेलूँ भाई ?"


घंटों बैठा सोचता रहा, 

आखिर सूझा एक ख्याल:

डायल किया नंबर बादल का,

फोन करा और किया सवाल,


"हाय-हेलो कैसे हो यार,

क्यों नहीं देते तुम दर्शन ?

फुरसत पाकर काम से कभी,

पधारो मेरे भी आंगन।"


छुट्टी के दिन रविवार को,

बादल ले आए तशरीफ़।

चांदनी ने खीर परोसी,

बादल ने करी तारीफ।


लिया डकार ऊंचा बादल ने,

कहा, "मुझे नींद है आई।"

"नींद भगाओ", बोला चंदा, 

"चलो खेलें लुकन-छुपाई।"


कहते ही जा छुपा चांद, 

नहीं देता कहीं दिखाई;

थका ढूंढ-ढूंढ कर बादल,

हर कोशिश व्यर्थ गँवाई।


मुस्कुरा कर निकला चांद,

कहा, "बादल तुम बुद्धू।

बुद्धि तेज़ होगी तुम्हारी,

जो खाओ घिया और कद्दू।"


"सारा अंबर देखा तुमने;

नहीं देखा बस अपने पीछे।

मैं कहीं नहीं छुपा था दूर,

था छुपा तुम्हारे ही पीछे।"


सुनकर बादल भी मुस्काया,

कहा, "करता हूं वादा-

खाकर फल और हरी सब्जियां,

होशियार बनूंगा ज्यादा।"


"अगली बार किसी भी खेल में,

रहूंगा तुम से आगे,

अब चलता हूं फिर मिलेंगे,

ओके, टाटा, बाय-बाय।"


           रचयिता - सलोनी चावला

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