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Sunday, August 1, 2021

चकौड़ा के पत्तों का निचला हिस्सा हो रहा काला...


रेवांचल टाइम्स - कृषि विज्ञान केंद्र मंडला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुुख डॉ विशाल मेश्राम को दूरभाष के माध्यम जानकारी प्राप्त हुई कि जिले के नैनपुर विकासखंड के तालाब टोला क्षेत्र में लगे चकौड़ों के पौधों में विचित्र बीमारी दिखाई दे रही है। जिसमें इसकी पत्तियों के निचले हिस्सों में कालापन दिखाई दे रहा है। सर्वप्रथम इसकी जानकारी दूरभाष के माध्यम से विकास प्रेरक एवं पर्यावरणविद भास्कर रमन द्वारा प्रदाय की गई। इस संबंध में त्वारित कार्यवाही करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र मंडला के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ विशाल मेश्राम द्वारा केंद्र में पदस्थ वैज्ञानिकों डॉ आरपी अहिरवार, डॉ प्रणय भारती एवं नीलकमल पंद्रे की संयुक्त टीम बनाकर तत्काल क्षेत्र का भ्रमण किया गया और आसपास के ग्रामीण, स्थाई निवासी लोगों से चर्चा की। स्थाई ग्रामीणों ने बताया कि इस तरह चकौड़े में जीवन में पहली बार ऐसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं जो अनायास ही लोगों की चिंता का विषय बन गया है। वर्तमान में कोरोना महामारी से गुजरने के पश्चात ब्लेक फंगस द्वारा उत्पन्न होने वाले गंभीर परिणामों के मद्देनजर रखते हुए लोगों का कयास है कि कहीं इनकी पत्तियों का कालापन भविष्य में मनुष्यों, पशुओं तथा वनस्पतियों एवं पर्यावरण में भी किसी प्रकार की बीमारी का पर्याय तो नहीं होगा। लोगों के विभिन्न प्रकार के कौतूहलों को विराम देने हेतू केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा चकौड़े के पौधे के सजीव नमूने एकत्रित किए गए हैं। जिन्हें जांच के लिए जवाहर लाल नेहरू, कृषि विश्व विद्यालय जबलपुर के पौधे कार्य की विभाग, पौध रोग विभाग एवं कीट रोग विभाग भेजा जाएगा। जिससे इसकी वास्तविकता ज्ञात हो सकें। डॉ विशाल मेश्राम ने ग्रामीणों से चकौड़ा के पौंधों को लेकर जानकारी देते हुए बताया कि चकौड़ा जिसका वानस्पतिक नाम केसिया टोरा है जिसे सेना तोरा या सिकल तोरा एवं हिन्दी में चकौड़ा, चकवड़ तथा संस्कृत में चक्रमर्द्र के नाम से भी जाना जाता है। जिले के जंगलों, सड़क किनारों, मैदानों में वर्षा ऋतु के आगमन पश्चात यह पौधा निकल आता है। शुरूआत में इसकी जब उंचाई 6 इंच के लगभग होती है तब लोग इसकी भाजी खाते हैं और उनका मानना है कि भाजी के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। वर्षा काल में होने वाली बुखार जैसी बीमारियों से रक्षा होती है जब इस पौधे में फल्लियां आती है और बीज पक जाते हैं। तब इसके बीज की चाय बनाकर पीते हैं। वहीं इन बीजों को गर्म तेल में डाल कर ठंडा किया जाता है तो वह तेल औषधीय गुणों से भरपूर हो जाता है। जो खाज खुजली के लिए भी बहुत उपयोगी होता हैं। मंडला जिले से इसके बीज छत्तीसगढ़ एवं देश के अन्य राज्यों तथा विदेशों जैसे चीन, जापान में भी विक्रय हेतु भिजवाया जाता रहा है। इसकी बाजार मूल्य 10 रुपये से 50 रुपये तक होने से खेती के अतिरिक्त आय का अच्छा विकल्प रहा है।

नैनपुर से राजा विश्वकर्मा की रिपोर्ट

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