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कवि चातक,अपर्णा दुबे ने वर्तिका की ऑनलाईन मासिक -काव्य गोष्ठी में किया शिरकत

 


 


रेवांचल टाईम्स :- कला - साहित्य के क्षेत्र में 35 वर्षों से क्रियाशील संस्था वर्तिका द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। वर्तिका सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था मध्य प्रदेश जबलपुर में आयोजित की गई इस भयावह काल में कुछ आनंदित क्षण काव्य संध्या के उड़ेले ,सम्मिलित हुई श्रीमती अपर्णा अतुल दुबे एवं रमेश श्रीवास्तव,, चातक,, सिवनी। 

   गोष्ठी की मुख्य अतिथि कवयित्री ममता जबलपुरी थीं । अध्यक्षता वरिष्ठ कवि राजेंद्र जैन रतन ने की । सारस्वत अतिथि | डॉ . राजलक्ष्मी शिवहरे , मीना भट्ट , विजेंद्र उपाध्याय एवं विशिष्ट अतिथि ज्योत्सना शर्मा , सिद्धेश्वरी सराफ , वंदना सोनी थीं । संयोजक विजय नेमा अनुज ने मासिक ऑनलाइन काव्य गोष्ठी के महत्व पर प्रकाश डाला । संचालन आशुतोष तिवारी एवं आभार यूनुस अदीब ने व्यक्त किया । अर्चना द्विवेदी गुदालू , मिथिलेश बड़गइयां , डॉ . मुकुल तिवारी ने अतिथि का स्वागत किया । द्वितीय सोपान में आयोजित काव्य गोष्ठी में आत्मबल , प्रेरणा , साहस , प्रकृति , पर्यावरणऔर परमात्मा की आराधना से जुड़ी कविताओं को प्रो.शरद नारायण खरे , डॉ.संध्या श्रीवास्तव , राजेन्द्र मिश्रा , मनोज शुक्ल मनोज , डॉ.सन्ध्या जैन श्रुति , बृंदावन राय सरल , प्रभा विश्वकर्मा शील , कृष्णा राजपूत , डॉ.सलमा जमाल , मिथिलेश , रुचिता तुषार नीमा , निशि श्रीवास्तव लखनऊ , मधु कौशिक , उमा मिश्रा प्रीति , रमेश श्रीवास्तव चातक , एड.प्रभा खरे इलाहाबाद , डॉ.राजेश ठाकुर , राजकुमारी रैकवार , छाया त्रिवेदी , डॉ.आशा श्रीवास्तव , उर्मिला श्रीवास्तव , आशा जैन , डॉ.संध्या शुक्ल मृदुल मंडला , अपर्णा दुबे , प्रभा गावंडे सिवनी , कविता नेमा , चन्दा देवी स्वर्णकार , मनोहर चौबे आकाश , प्रभा श्रीवास्तव बच्चन , उर्मिला श्रीवास्तव , कुंजीलाल चक्रवर्ती निर्झर , इन्द्र बहादुर श्रीवास्तव , दीपेश दवे , रत्ना ओझा रत्न , कालिदास ताम्रकार काली ने प्रस्तुत की।


सिवनी से रमेश श्रीवास्तव चातक एवं अपर्णा अतुल दुबे ने सिवनी का प्रतिनिधित्व कर सिवनी की उपस्थिति दर्ज कराई सम्मिलित अपर्णा ने मातृभूमि को समर्पित रचना से सबका मन मोह लिया।


जय भारती -जय भारती

जय भारती -जय भारती

मां है तुम्हें पुकारती पल पल तुम्हें निहारती।।

ब्रह्मा की रचना स्वर्णिम सपना

विश्व विजई हो भारत अपना

वीणा की धुन में नाचे यमुना

ऋषियों की भूमि करते साधना

संजीवनी है उतारती

मां है तुम्हें पुकारती

शीश मुकुट साजे है हिमगिरी

शंभू जटा से गंगा हैं गिरी

सूर्य का गोला है रक्तामणि

गिरी की पहनने हैं मुक्तामणि

गंगा यमुना की पहनने की  किंकड़ी,, सरस्वती लागे सुंदर तरुणी,, वरदायिनी है उतारती

मां है तुम्हें पुकारती

मां है तुम्हें पुकारती........

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