रेवांचल टाईम्स डेस्क :- अब हमारा देश भारत वेक्सीन की किल्लत भोग एह है | देश में 40 साल से नीचे उम्र वालों वैक्सीन सुलभ नहीं है | जगह-जगह से वेक्सीन आसानी से सुलभ होने के नकारात्मक खबरे आ रही है | सवाल एक और भी है. वो बौद्धिक सम्पदा अधिकार से जुडा है,,अगर वेक्सिन के बारे में बौद्धिक संपदा अधिकार को हटाने का निर्णय हो भी जाता है, तो भारत के संदर्भ में तुरंत इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है | हमारी स्थिति यह है कि हमें वैक्सीन चाहिए. यदि नये सिरे से वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया शुरू की जायेगी, तो इसमें कुछ साल नहीं, तो कई महीने का समय अवश्य लग सकता है. वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया ऐसी नहीं होती, जैसे कोई स्विच ऑन या ऑफ करना है| इसमें समय लगेगा क्योंकि प्रक्रिया के अनेक चरण होते हैं. तो, यह सवाल है कि आखिर अभी इसकी उपयोगिता क्या है. यदि पेटेंट में छूट मिल भी जाती है, तो उसके लिए एक समय-सारणी का निर्धारण करना होगा|
सब जानते है विश्व व्यापार संगठन में 190 से अधिक देश हैं| यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि पेटेंट छूट जैसे संवेदनशील मसले पर फैसला किस रूप में होता है| भारत ने बौद्धिक संपदा अधिकार में छूट देने का जो प्रस्ताव रखा है| उसे 120 देशों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन विभिन्न आयामों के हिसाब से यह आंकड़ा 80 के आसपास है. प्रस्ताव के पक्ष में व्यापक समर्थन और सहमति जुटाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है|
छूट के लिए पेटेंट नियमन के हर प्रावधान, प्रस्ताव और शब्द पर चर्चा होगी. इसका मतलब है कि बातचीत में ही कई महीने गुजर जायेंगे. इसके अंत में ही हम छूट की अपेक्षा कर सकते हैं. यह छूट कोई ऐसी चीज नहीं है कि इसका फैसला अकेले अमेरिका कर सकता है| अमेरिका ने भले ही छूट का समर्थन किया है, पर उसके भीतर ही इस पर सहमति नहीं है| अमेरिका में दवा उद्योग बहुत शक्तिशाली है और पेटेंट का मसला उनके लिए बेहद संवेदनशील है|
अमेरिकी कांग्रेस में तो छूट के प्रस्ताव को रोकने के लिए कानून बनाने की चर्चा भी चल रही है|राष्ट्रपति जो बाइडेन ने छूट का समर्थन किया है| ऐसी कोशिश है कि वे खुद को इस छूट को रोकने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं दिखना चाहते| अनेक यूरोपीय देश भी इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं| जर्मनी भी इसे रोकने का प्रयास करेगा| बाइडेन की घोषणा के बाद चांसलर मर्केल ने स्पष्ट कह दिया है कि वे छूट के विरोध में हैं|, हमें समझना होगा कि यह पूरा मामला अभी कहीं जाता हुआ नहीं दिख रहा है. अगर छूट मिलती है, तो बहुत अच्छा है, परन्तु पेटेंट छूट से हमें कोई तुरंत राहत नहीं मिलेगी.|
अब सामने सवाल है कि अभी बेहतर रास्ता क्या है? एक रास्ता तो यह है कि हमें अपने दरवाजे-खिड़कियां खोलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध अधिक से अधिक टीके हासिल करने का प्रयास करना चाहिए| यह सुझाव विपक्षी दलों ने अपने पत्र में भी दिया है. इसके बाद वैक्सीन का वितरण बड़े पैमाने पर और निशुल्क किया जाना चाहिए ताकि आबादी के अधिकांश हिस्से का टीकाकरण संभव हो सके|
विपक्षी दलों ने समयबद्ध तरीके से महामारी से जूझने का जो सुझाव दिया है, वह बहुत व्यावहारिक है और उस पर अमल करने की आवश्यकता है| जहां तक पेटेंट का मामला है, तो हमें यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि यह एक बहुत संवेदनशील विषय है| अमेरिका और चीन के बीच जारी मौजूदा तनातनी का यही मुख्य कारण है|
वास्तव में पेटेंट में छूट की वर्तमान मांग कोई फायदा उठाने का मसला नहीं है| यह एक आपातस्थिति में राहत से जुड़ा सवाल है\ इसलिए यह लेन-देन से तय होनेवाला मुद्दा नहीं है| हमारे पास वैक्सीन की कमी है और इस दुष्काल से बचने का एकमात्र रास्ता टीकाकरण ही है| आबादी के अधिक-से-अधिक हिस्से को वैक्सीन देकर ही कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम हो सकती है|अमेरिका और अन्य कुछ देशों के अनुभव यह इंगित करते हैं कि जितनी अधिक संख्या में लोगों का टीकाकरण होगा, महामारी के प्रसार की गति धीमी होती जायेगी| इसलिए वैक्सीन पेटेंट में छूट की मांग कोई कारोबारी या अन्य तरह का लाभ उठाने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को महामारी से बचाने की कोशिश से प्रेरित है|दुर्भाग्य से हम एक क्रूर दुनिया में रह रहे हैं. इसके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है|
राकेश दुबे

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