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Monday, May 31, 2021

हिंदी पत्रकारिता : कब तक नेता इन्हें बचायेंगे ?...

 



रेवांचल टाईम्स :-  हिंदी पत्रकारिता दिवस पर  भारत को और विशेषकर उन लोगों के विचार का समय है |जो हिंदी भाषा को केंद्र में रखकर समाचार पत्र, वेब चैनल, पोर्टल आदि चला रहे हैं | ये संस्थान मूल रूप से पत्रकारिता करने के लिए नहीं, बल्कि इससे इतर कामो में सक्रिय हैं | इसमें वे अब बहुतायत वे लोग है, जो पूरी जिन्दगी सरकारी नौकरी में धन और सुविधाएँ दोनों हाथों से बटोरते रहे अब अपना जलवा कायम रखने के लिए  मीडिया में जमने के प्रयास कर रहे हैं | पत्रकारों और गैर पत्रकारों का वेतन न देना ऐसे लोगों की आदत  बनती जा रही है | इन्होने चंद राज नेताओं का सहारा पकड़ रखा है | वेतन न मिलने या कम मिलने पर इससे बेहतर मिसाल विश्व में नहीं है |

“पत्रकारों को कम वेतन नही देना चाहिए। कम वेतन पाने वाला पत्रकार अधिक खतरनाक हो सकता है” कभी यह रोचक निष्कर्ष निकाला था, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने। कार्ल मार्क्स पर उनकी यह एक रोचक टिप्पणी है। यह कथन जॉन एफ केनेडी के ओवरसीज प्रेस क्लब न्यूयॉर्क में आयोजित एक पुरस्कार समारोह में, 6 मई 1957 को, दिए गए भाषण का एक अंश है। यह भाषण, जब वे सीनेटर थे तब उन्होंने दिया था। कार्ल मार्क्स, कभी  न्यूयॉर्क ट्रिब्यून में एक पत्रकार की हैसियत से काम करते थे। वे उक्त अखबार के लिये लिखते थे, लेकिन उन्हें जो पारिश्रमिक मिलता था, वह उनके जीवन यापन के लिये पर्याप्त नहीं होता था। मार्क्स, उक्त अखबार में फॉरेन करसपोंडेंट थे । उन्होंने फिर अखबार की नौकरी छोड़ दी और फिर जिस काम मे वे जुटे उसने दुनिया बदल कर रख दी। उनकी सोच और विचारधारा ने, लेनिन, स्टालिन, माओ, कैस्त्रो, चे जैसे लोगों को जन्म दिया जिन्होने दुनिया मे द्वंद्ववात्मक भौतिकवाद के दर्शन और बाद में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से उद्भूत विचारधारा के आधार पर दुनिया मे बदलाव और क्रांति की पीठिका रखी।

 

अखबार में नौकरी के दौरान, कार्ल मार्क्स, की आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी और वे निरन्तर अर्थाभाव में रहने लगे। उन्होंने अपनी तनख्वाह बढ़ाने के लिये अखबार के मालिक, ग्रीली और प्रबंध संपादक, चार्ल्स डाना से, कम से कम 5 डॉलर की वृद्धि करने का अनुरोध किया। लेकिन अखबार ने भी यह कह कर कि, उसकी भी आर्थिक स्थिति, अमेरिकी गृह युद्ध के कारण अच्छी नहीं है, कार्ल मार्क्स की तनख्वाह बढाने से मना कर दिया। इस पर मार्क्स और एंगेल्स ने अखबार पर उन्हें ठगने और अपने शोषण करने की क्षुद्र पूंजीवादी सोच से ग्रस्त होने का आरोप लगाया और जब मार्क्स की तनख्वाह नहीं बढ़ी तो, उन्होंने ट्रिब्यून की नौकरी छोड़ दी और फिर वे अपने अध्ययन और दर्शन को समृद्ध करने में एंगेल्स के साथ पूरी तरह से जुट गए। फिर जो हुआ, वह बौद्धिक क्षेत्र में एक ऐसा बदलाव था, जिसने दुनिया बदल दी।

 

इसे एक बेहद तार्किक और गम्भीर कथन के रूप में देखा भी जा सकता है। अभाव में जीता हुआ व्यक्ति यदि उक्त अभाव के कारणों की तह में जाता है और जब अपने उचित अधिकारों के लिये तन कर, उक्त अभाव के समाधान के लिए, समाज मे खड़ा हो, मुखर होने लगता है तो, न केवल उसी की परिस्थितियां बदलती हैं बल्कि वह समाज को एक दिशा भी देने की हैसियत में आ जाता है। वह अकेले नहीं रह पाता है। क्योंकि वही अकेले अभाव में नहीं रहता है बल्कि समाज का अधिसंख्य भी तो उसी अभाव को झेलता रहता है। फिर शोषण और उत्पीड़न की उन परिस्थितियों के खिलाफ एक दिमाग बनता है, सवालात जन्म लेते हैं, उनके उत्तर ढूंढे जाते हैं, और कुछ लोग कसमसाते हैं और फिर खड़े होने लगते हैं। उन्ही में से नेतृत्व उभरता है और फिर जो बदलाव का सिलसिला शुरू होता है वह एक झंझावात में बदल जाता है, जिसे हम क्रांति या रिवोल्यूशन कहते हैं।

 

जब कोई आवाज़ उठती है, कहीं कुछ खदबदाता है तो उसमें अराजकता ढूंढने लगता है।

          अराजकता, जनता का जागना, अपने शोषण औऱ अन्याय के खिलाफ खड़े होना, नहीं होता है, बल्कि अराजकता, राज्य का विधिक औऱ लोककल्याणकारी शासन से अलग हट कर, खुद या कुछ की स्वार्थपूर्ति को प्राथमिकता में रख कर, राज करना भी है। राज्य द्वारा किया जा रहा ज्यादतीभरा और दमनकारी शासन, ही असल मे अराजकता है, न कि इस अराजक शासन व्यवस्था के विरुद्ध जनता का उठ खड़ा होना और राज्य को उसके दायित्व और कर्तव्यों के प्रति सचेत करना बड़ा काम है ।

                                           राकेश दुबे

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