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Wednesday, May 12, 2021

दुष्काल :- चिकित्सीय ज्ञान को सर्वसुलभ कीजिये



रेवांचल टाईम्स डेस्क :- देश में रोज आपके प्रिय कोरोना से काल कवलित हो रहे हैं | आज देश में सीमित जानकारी रखने वाले गैर-चिकित्सीय समुदाय के लोगों को कोविड-१९ से बचाव के बारे में जानकारी पर आधारित सलाह दिए जाने की जरूरत है।सबको यह तो मालूम है कि हमेशा मास्क पहनना है, शारीरिक दूरी का पालन करना है, टीकाकरण अभियान और रोजमर्रा की इन आदतों के अलावा हमें महामारी से संभावित बचाव और शुरुआती दौर के इलाज के बारे में सुझावों की जरूरत है। यह एक मुश्किल काम है, लेकिन किसी भी ज्ञात रोकथाम उपायों पर विचार करने से सुरक्षा प्रोटोकॉल मजबूत हो सकता है। इसी तरह संक्रमण के बाद के शुरुआती दौर में इलाज को लेकर भी सही सलाह लोगों की मदद करेगी।

हमें रोज रोग-निरोधी उपायों के बारे में संकलित जानकारी मिलती और उसके हिसाब से संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाता तो काफी उपयोगी होता। अगर सुरक्षित यौगिकों के बारे में पता है तो सकारात्मक सबूतों का इंतजार करने के बजाय उनका विस्तार किया जा सकता है। अगर परीक्षणों का डिजाइन एवं समन्वय करना है तो इन जानकारियों को संभव सीमा तक प्रोत्साहित किया जा सकता है।

यह समय हमारी खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से बहुत अधिक उम्मीद पालने का नहीं है। फिर भी, सलाह देने और परीक्षणों में मददगार बनने की क्षमता का कोई विकल्प नहीं है। अगर निजी क्षेत्र के मददगार बनकर आगे आने की उम्मीद है तो लाभ की संभावना की तुलना में समय, प्रयास, लागत एवं जोखिम के निवेश पर गौर करने से पता चलता है कि इसमें अधिक वक्त लग सकता है।

ऐसा लगता है कि इस घातक वायरस के खिलाफ हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली में निरोधक उपायों के असर को लेकर अचरज हो सकता है या फिर परीक्षणों के जरिये पुष्टि में आने वाली मुश्किल क्या निरोधक उपायों या शुरुआती इलाज के प्रोत्साहन की कमी को बयां करती है? निरोधक दवाओं के दो संभावित उम्मीदवार पोविडोन-आयोडिन (जिन्हें बीटाडिन के ब्रांड नाम से जाना जाता है) और आइवरमेक्टिन हैं। पोविडोन-आयोडिन के रासायनिक युग्मक का एक लोकप्रिय ब्रांड बिटाडिन है। इसके निर्माण में आयोडिन के साथ जल में घुलनशील बहुलक पोविडोन का इस्तेमाल होता है। धीमी गति से आयोडिन निकलने से यह दवा जीवाणु-नाशक एवं विषाणु-रोधी के रूप में काफी असरदार साबित होती है और यह न तो पीड़ा पहुंचाता है और न ही धुंधला पड़ता है।

थाइरॉयड की समस्या से जूझ रहे लोग, गर्भवती महिलाएं और रेडियो-आयोडिन थेरेपी करा रहे लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। अमेरिका में बिटाडिन की वेबसाइट इस दवा को कोविड-१९ के खिलाफ भी असरदार बताती है। हाल में हुए कई अध्ययन बताते हैं कि पोविडोन-आयोडिन सार्स-कोरोनावायरस-2 और अन्य वायरस के खिलाफ नाक एवं मुंह में एक असरदार वायरस-रोधी युग्मक है। कोरोनावायरस के खिलाफ इसकी वायरस-रोधी गतिविधि की पुष्टि कई रिपोर्ट करती हैं और वायरल लोड को सीमित कर शुरुआती दौर के संक्रमण की गंभीरता भी कम करता है। स्थापित परंपरा के साथ ही कई अध्ययन भी इसकी पुष्टि करते हैं कि पोविडोन-आयोडिन कुछ खास समूहों को छोड़कर प्रभावी एवं सुरक्षित है। लेकिन प्रश्न यह है क्या इसे एक संभावित रोग-निरोधी के तौर पर बढ़ावा दिया जा सकता है?

दूसरा विकल्प आइवरमेक्टिन है जो उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के इलाज प्रोटोकॉल में पहले से ही शामिल है। एक संक्रमण से बचाव करने वाली दवा के तौर पर आइवरमेक्टिन देने की अनुशंसा स्वास्थ्य विभाग ने की हुई है। वहीं संक्रमण हो जाने के बाद डॉक्सीसाइक्लिन का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बयान इन दवाओं के इस्तेमाल का बहुत समर्थन नहीं करते हैं। आइवरमेक्टिन का इस्तेमाल दुनिया भर में सालों से गोल-कृमि एवं आंत के परजीवियों के इलाज के अलावा खुजली जैसे त्वचा रोगों में किया जाता रहा है। अगर एक या दोनों ही दवाएं असरदार हैं और खास लोगों को छोड़कर अन्य के लिए सुरक्षित मानी जाती हैं तो क्या महामारी विशेषज्ञ उन्हें निरोधक प्रोटोकॉल में शामिल करने के बारे में गौर करेंगे? यह टीकाकरण, मास्क पहनने, दूर-दूर रहने एवं हाथों को धोते रहने जैसे निरोधक उपायों से अलग होगा।

आइवरमेक्टिन के अलावा मुंह में नारियल तेल डालने की आयुर्वेदिक पद्धति के बारे में कुछ परीक्षण फिलीपींस एवं इंडोनेशिया में किए गए हैं। दूसरा विकल्प, सांस खींचने वाले पुनर्संयोगी इंटरफेरॉन (संक्रमित कोशिकाओं में बनने वाला वायरस-रोधी प्रोटीन) से जुड़ा परीक्षण है। शुद्ध नारियल तेल (वर्जिन) के औषधीय गुणों के बारे में फिलीपींस में दशकों से अध्ययन होता रहा है। कोविड-19 के इलाज में इसके इस्तेमाल के बारे में एक रिपोर्ट 2020 के अंत में प्रकाशित हुई थी। उनसे इसका संकेत मिलता है कि शुरुआती दौर के इलाज में वर्जिन नारियल तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रतिरोधकता संवद्र्धन- इंटरफेरॉन बीटा-1ए (एसएनजी001 ) -वर्ष 2003 में साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी के शिक्षकों ने सांस की बीमारियों में जैव-प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल एवं दवाओं की खोज के लिए सिन्एयरजेन नाम की एक कंपनी शुरू की थी। उन्होंने 2009 में पुनर्संयोगी इंटरफेरॉन बीटा-1 ए एसएनजी 001को विकसित किया था जिसे सांस के साथ खींचकर लिया जा सकता है। अमेरिका में इस बीटा का पेटेंट आईएफएन-बीटा के नाम से है।

इंजेक्शन के तौर पर इंटरफेरॉन बीटा-1 ए का इस्तेमाल नब्बे के दशक से ही नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारी मल्टीपल स्किलरोसिस के इलाज में होता रहा है।

फिलीपींस की सरकार ने वर्जिन नारियल तेल, आइवरमेक्टिन एवं मेलेटोनिन जैसी दवाओं के परीक्षण में महारत हासिल कर ली है। परीक्षणों का आकार छोटा होने के बावजूद उसका उदाहरण प्रेरणादायक है। हमारे जानकार भी शायद इस पर सोच सकते हैं कि निरोधक दवा के साथ शुरुआती इलाज में असरदार दवा के तौर पर आइवरमेक्टिन को क्या परीक्षणों के जरिये वैधता हासिल करने की जरूरत है या फिर उसे कोविड प्रोटोकॉल में शामिल किया जा सकता है?

राकेश दुबे

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