रेवांचल टाईम्स डेस्क :- डाउन ने तर्कशील लोगों को विश्लेष्ण का अवसर देकर बड़ा उपकार किया | कोरोना के बहाने सरकार उसकी कार्य पद्धति समझ में आई | वर्तमान केंद्र सरकार के फैसले उसके शीर्ष नेतृत्व की भांति है | हर किसीकी रूचि चीजों को गहराई से समझने के स्थानपर एक बड़ी योजना में रहती है। लेकिन चीजों को विस्तार से समझने में रुचि न होना एक बात है, परन्तु सरकार की प्राथमिकताएं किसी भी ऑपरेशन में किनारे खड़े रहने तक भी सीमित नही है, बल्कि उसमें एक साहसी और काल्पनिक दखल देने में भी हैं। यह निष्कर्ष इस साल मार्च के अंत में आई एक रिपोर्ट के हैं , जिसमे यह भी लिखा है “पिछले साल लगाए लॉकडाउन से पहले किसी भी मंत्रालय से कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया और न ही इसके परिणामों पर कोई चर्चा हुई।“ इसे क्या कहेंगे ?
इस सर्वे के लिए सूचना के अधिकार के तहत विभिन्न मंत्रालयों में 240 अर्जियां दाखिल की गई । जिस में स्वास्थ्य, वित्त, आपदा प्रबंधन मंत्रालय भी शामिल हैं।कोशिश थी यह पता लगाना कि देश व्यापी लॉकडाउन से पहले क्या उन मंत्रालयों से कोई सलाह मशविरा हुआ था या नहीं। इन अर्जियों के जवाब से पता लगा कि न किसी विशेषज्ञ और न ही किसी विभाग से इस बारे में कोई चर्चा हुई। सरकार ने इस बारे में बयान देने से इनकार कर दिया कि क्यों इस बारे में मंत्रालयों और विभागों से चर्चा नहीं की गई।
काम करने के इस तौर-तरीके का सटीक उदाहरण है नोटबंदी। इसमें भी सिवाय कुछ मुट्ठीभर लोगों को ही पता था कि क्या होने वाला है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाते भारत में सामूहिक जिम्मेदारी के नियम को माना जाता है। लेकिन जिस दिन नोटबंदी का ऐलान हुआ उस दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल तक को इसकी भनक नहीं थी कि 8 नवंबर को 1000 और 500 रुपए के नोट यानी देश की 86 प्रतिशत मुद्रा चलन से बाहर हो गई या कर दी गई । वास्तव में इस कदम के लिए नौकरशाही न सिर्फ तैयार नहीं थी, बल्कि जानबूझकर इसे इस तंत्र से छिपाकर रखा गया।
यह तरीका सही है या गलत है या फिर इसके फायदे-नुकसान क्या हैं, इस पर विश्लेष्ण आ सकते है, तर्क –वितर्क हो सकते हैं । यहाँ मुद्दा यह है कि क्या यह तरीका उन हालात में काम कर सकता है जिनमें इन दिनों देश हैं। आज दुष्काल जैसी समस्या से सिर्फ एक मास्टर स्ट्रोक से नहीं निपटा जा सकता। इसके लिए सरकार को हालात की सही जानकारी होना जरूरी है, उसके पास क्या संसाधन है और आने वाले दिनों किन संसाधनों की जरूरत हो सकती है, उसका एहसास होना जरूरी और हालात क्या करवट ले सकते हैं उसपर दूरंदेशी से काम करना जरूरी है। आज बेहद केंद्रीकृत व्यवस्था में फैसले चंद चुनिन्दा लोगों और द्वारा लिए जाते हैं, इसके परिणाम हम देख रहे हैं।देश भुगत रहा है |
ऑक्सीजन, वेंटिलेटर्स और वैक्सीन की कमी पर आई सरकार की प्रतिक्रिया से साफ है कि सरकार में किसी ने इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं। इसके विपरीत हकीकत यह है कि पूरी दुनिया इस बारे में सोच रही थी। आज हमें विदेशों से मदद के नाम पर जो कुछ मिल रहा है वह ऐसा नहीं है कि हमारे लिए उसे बनाया गया है, बल्कि उन देशों में हालात को दूरंदेशी से देखने के बाद तैयार किया गया सामान है जो वहां की सरकारों ने उन हालातों का पूर्वानुमान लगाकर तैयार कराया था जो इन दिनों हम भारत में देख रहे हैं। उन्होंने हालात का तैयारियों के साथ मुकाबला किया और इसीलिए उनके यहां इतना जरूरत से ज्यादा सामान तैयार था। कोई भी देश इतने महंगे सामान को सिर्फ इसलिए तैयार कर नहीं बैठा होगा कि आने वाले दिनों में भारत को इसकी जरूरत पड़ेगी। आज अगर हमारे पास पर्याप्त वैक्सीन नहीं हैं तो इसलिए क्योंकि सरकार ने समय रहते उनका ऑर्डर नहीं दिया, क्योंकि सरकार को तो लगता था कि हमें उसकी जरूरत ही नहीं है।
प्रधानमंत्री का वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में दिया भाषण याद आता हैं, “भारत उन देशों मेंसे हैं जिन्होंने कामयाबी के साथ अपने लोगों की जान बचाई है और संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या तेजी से कम हो रही है।” उन्होंने आगे कहा था, “भारत की सफलता को दूसरे देशों के साथ जोड़कर नहीं देखना चाहिए, क्योंकि भारत में विश्व की कुल आबादी के 18 प्रतिशत लोग रहते हैं, भारत ने कोरोना को प्रभावी तरीके से काबू करके मानवता को एक तबाही से बचाया है।”देश ने इसके बाद दूसरे दौर की तबाही भुगती है |
आंकड़े देखे और मान लिया कि कोरोना को हराने में भारत अनोखा देश साबित हुआ। जबकि दूसरे देशों ने इसे गंभीरत से लिया और अनुमान लगाया कि सिर्फ एक लहर में रुकने वाली बीमारी नहीं है यह। उन्होंने समय रहते वैक्सीन का ऑर्डर दिया। उन्होंने वैज्ञानिकों को तय करने दिया कि, स्वास्थ्य सेवाओँ में बढ़ोत्तरी और वैक्सीनेशन ही इस महामारी को रोक सकते हैं तो उन देशों ने उसी पर फोकस किया और अपने सारे संसाधन वहां लगाए।हम क्या क्या करते रहे सबको मालूम है }
सवाल है कि आखिर हम कोरोना की इस विध्वंसकारी दूसरी लहर को आते क्यों नहीं देख सके और तीसरी की आहट सुन रहे हैं। इसका जवाब यही है कि अगर नेतृत्व हालात को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले तो उसकी पकड़ यानी ग्रिप मजबूत होनी चाहिए न कि कोई जीनियस मास्टर स्ट्रोक। हो सकता है कि काम का यह तरीका कुछ मामलों में फायदेमंद हो, लेकिन इस दौर में तो यह नाकाम ही साबित हुआ है।
राकेश दुबे

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