रेवांचल टाईम्स :- दिल्ली में प्रधानमंत्री को इंगित करते हुए चस्पा पोस्टर, उसके बाद २ दर्जन से अधिक लोगों की गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में एक अंडरकरंट फैल गया है, सरकार को समझना चाहिए और ख़ास तौर पर इस दौर में जब सोशल मीडिया समाज के हर तबके को सुलभ है |इस सारे सन्दर्भ में मुझे डॉक्टर बी आर अंबेडकर का संविधान सभा के समापन दिया भाषण मेंयाद आ रहा है| डॉ अबेडकर ने कहा था कि , “मैं समझता हूँ कि कोई संविधान चाहें जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहें जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों।” सरकार इस दुष्काल में अव्यवस्था से उपजी निराशा,क्षोभ,और गुस्से की सबसे हल्की और पहली प्रतिक्रिया विरोध पोस्टर ही तो है |इस पोस्टर कांड पर सरकार ने जो किया उसे स्वतन्त्रचेता अतिरेक कार्रवाई की संज्ञा दे रहे हैं |
सच मायने में बाबा साहब के इन शब्दों को बार बार पढ़ने और समझने की ज़रूरत आज सबसे ज़्यादा है। लोकतंत्र क्या है? उसको किस तरह देखा जाना चाहिए?लोकतंत्र का बेहद आसान और सीधा सा मतलब है लोगों का शासन पर अगर इसी लोकतंत्र में लोक के विचारों की वैचारिक असहमतियों की हत्या लगातार की जा रही हो और केवल शासन शासन ही रह जाये तो क्या उसे लोकतंत्र समझा जाएगा?भारत कुछ समय पूर्व सीएए, एनआरसी के विरुद्ध हुए एक आंदोलन का साक्षी है | नागरिकता क़ानून को लेकर छिड़ी इस बहस ने पूरी दुनिया के लोगों को समानता, लोकतंत्र, न्याय, समता में विश्वास रखने वाली भारत की आवाज़ों के प्रति आकर्षित किया। अब दुष्काल और भारत के हालात से विश्व वाकिफ है |
वैसे यह क़ानून भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर हमला है, यह समानता के अधिकार का खुला हनन है। सरकार ने इस क़ानून के साथ विवादित एनआरसी को भी लाने का ऐलान करके मुस्लिम समुदाय के मन मे न केवल दोयम दर्जे का नगरिक होने की भावना को बढ़ावा दिया बल्कि समुदाय विशेष के मन में अपने भविष्य को लेकर डर भी पैदा किया कि अगर एनआरसी से वो बाहर हो गए तो उनको देश से निकाल डिटेंशन सेंटर में डाल दिया जाएगा।
इसी “अगर” ने भारत मे सीएए के विरुद्ध इतने बड़े आंदोलन की भूमि तैयार की पर निश्चित तौर पर यह आंदोलन केवल समुदाय विशेष के ख़ौफ़ से नहीं उपजा बल्कि समानता, न्याय, बंधुत्व में विश्वास रखने वाले और संविधान में घोर आस्था रखने वालों की आवाज़ों ने इसे और मज़बूत किया।अब पूरा देश इस दुष्काल के कुप्रभावों को झेल रहा है | राजनेता और उनके अंध भक्त मलाई काट रहे हैं | दलाली का दौर चरम पर है | इससे उपजा पोस्टर आन्दोलन वैसा ही है,जैसे शाहीन बाग़,था, दिल्ली की औरतें विरोध की ताक़तवर आवाज़ बनीं थी । देखते ही देखते शाहीन बाग़ की ही तर्ज पर देश मे जगह-जगह शाहीन बाग़ बन गए जहां विरोध का, क्रांति का झंडा महिलाओं ने अपने हाथ मेंं लिया।
यह ऐतिहासिक आंदोलन औरतों की वो सशक्त आवाज़ बन कर उभरा की पूरी दुनिया मे समानता और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगो ने अपना समर्थंन भारत के आन्दोलनकारियों को दिया।आज भी देश में वैसा ही अंडरकरंट है | कोरोना दुष्काल ने इस आंदोलन की उठती आवाज़ों को मजबूत किया है | याद रहे कि हमारी सरकार आपदा को अवसर में बदलने का हुनर रखती है। इसी हुनर को आज़माते हुए सरकार ने दुष्काल से निबटने के बजाए पोस्टर आंदोलन में सक्रिय रहे लोगों को एक एक करके गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। ये तमाम लोग भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि की रक्षा के लिए लड़ रहे है। ये तमाम लोग संविधान के लिए लड़ रहे है। लोकतंत्र के लिए लड़ रहे है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में होना तो यह चहिये था वैचारिक असहमतियांं रखने वाले और अन्याय के ख़िलाफ़ जमकर लड़ने वाले लोगों का सम्मान किया जाये । आज एक बार फिर बी आर अंबेडकर के शब्दों को याद कीजिए और इन सवालों के जवाब खोजिए इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
राकेश दुबे

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