रेवांचल टाइम्स - अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के पावन दिन में अर्पणा अतुल दुबे की ओर से
गूंजती मेरी आवाज इतिहास के हर्फो में बनकर हुंकृति,,,,,,,,,,,
मेरे रूप में ही तो गड़ी है ,,कुदरत,, ने अपनी सबसे मनोरम कृति,,,,,
मुझसे ही पनपती सभ्यता,,,,,,,,,, मुझमें ही झलकती संस्कृति,,,,,,,, मुझमें ही मुस्कुराती एक सुडोल और सुंदर आकृति,, फिर भी पहुंचाते सभी मुझे ही क्षति ।
मैं ही हूं सुनीति,, दिलाती सदैव उन्नति,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, देवताओं ने भी गुनगुनायी मेरी स्तुति,,, ,,नारी तू अबला,, फिर क्यों अतीत से मिली? मुझे ये अनुश्रुति ।।
मैं गरिमा भारत की सुनाती हूं आज अपनी आपबीती,,,,,,,,,,
,, झांसी की तलवार,, में खनकती थी मेरी देशभक्ति,,,,,,,,,,,,,,,,
दुर्गा के रूप में,,,,,,दुश्मनों को दहाड़ती,, मैं ही थी दुर्गावती ।।
मेरे सतीत्व के गवाह हैं आज वो सप्तर्षी,, दुराचारीयों ने की सदा मेरे चरित्र की डकैती,,,,, मरणोपरांत भी ना मिली मुझे अनुरक्ति,, ना मुक्ति ।।
विनोद दुबे के साथ रेवांचल टाइम्स की एक रिपोर्ट

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