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Sunday, February 28, 2021

बैंकों का निजीकरण: सरकार ने समग्र रूप से विचार नहीं किया




रेवांचल टाईम्स डेस्क :- यह तो होगा कि सरकारी बैंकों के विनिवेश से कुछ हजार करोड़ जरूर आ जाएँ , लेकिन उससे सरकार को कितना फायदा होगा इसका भी आकलन करने की भी जरूरत है, फायदा नकदी में हो, यह जरूरी नहीं है. सवाल रोजगार जाने का और बचे हुए सरकारी बैंकों पर काम का दबाव बढ़ने का भी है| सरकार ने शायद समग्र रूप से विचार नहीं किया है या उसे भविष्य का अनुमान और चिंता नहीं है |

ऐसा  भारत के बैंकिंग इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब सरकार चार सरकारी बैंकों को बेचेगी या उनका निजीकरण करेगी| वैसे मार्च २०१७  में, देश में २७ सरकारी बैंक थे, जिनकी संख्या अप्रैल २०२०  में घटकर १२  रह गयी. अब चार सरकारी बैंकों- बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहती है| इनमें बैंक ऑफ इंडिया बड़ा बैंक है, जबकि अन्य तीन छोटे. बैंक ऑफ इंडिया में५०००० , सेंट्रल बैंक में ३३००० इंडियन ओवरसीज बैंक में २६००० और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में १३००० कर्मचारी कार्यरत हैं. इन सबकी कुल १५७३२ शाखाएं हैं |

इसके मूल में कोरोना काल में सरकारी राजस्व में भारी कमी आना है| सरकार विनिवेश के जरिये इस कमी को पूरा करना चाहती है| वित्त वर्ष २०२१  में सरकार के लिए विनिवेश के लक्ष्य को हासिल करना लगभग नामुमकिन है| इसलिए, वित्त वर्ष २०२१  में विनिवेश के लक्ष्य को कम करके ३२००० करोड़ रुपये किया गया है| वित्त वर्ष २०२२  के लिए सरकार ने विनिवेश से राजस्व हासिल करने का लक्ष्य १.७५ लाख करोड़ रखा है, जिसमें से एक लाख करोड़ सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में सरकार की हिस्सेदारी बेचकर जुटाने का प्रस्ताव है|

इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार की हिस्सेदारी ९५.८ प्रतिशत, बैंक ऑफ महाराष्ट्र में ९२.५ प्रतिशत, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में ९२.४ प्रतिशत और बैंक ऑफ इंडिया में ८९.१ प्रतिशत है. बैंक ऑफ महाराष्ट्र और सेंट्रल बैंक में अगर सरकार अपनी हिस्सेदारी को घटा कर 51 प्रतिशत करती है, तो उसे 6400 करोड़ रुपये मिलेंगे| इसी तरह, यदि सरकार बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच देती है, तो उसे लगभग 28600 करोड़ मिलेंगे|इंडियन ओवरसीज बैंक के पास सबसे ज्यादा इक्विटी कैपिटल है, जबकि बैंक ऑफ इंडिया के शेयरों का बाजार मूल्य दूसरे सरकारी बैंकों से ज्यादा है|.

 यह सही है बैंकों को बेचने से सरकार को उसकी पूंजी वापस मिल जायेगी, इन बैंकों में और अधिक पूंजी डालने की जरूरत नहीं होगी,|जिससे सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा, वित्त मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग आदि जैसे सरकारी विभागों को इन संस्थानों की निगरानी और पर्यवेक्षण की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे मानव संसाधन और धन दोनों की बचत होगी. कुछ लोग कयास लगा रहे हैं कि नये अधिग्रहणकर्ता बैंक को अधिक पूंजी वृद्धि के साथ कुशलता से चला पायेंगे|

आज भले ही सरकार बैंकों को बेचना चाहती है, लेकिन इन्हें बेचना उसके लिए आसान नहीं होगा| चार सरकारी बैंकों के निजीकरण से वहां कार्यरत कर्मचारियों की नौकरी जाने की संभावना बढ़ जायेगी |इसलिए, इन बैंकों के निजीकरण का नकारात्मक प्रभाव सरकार की छवि पर  निश्चित ही होगा |इन बैंकों का सेवा शुल्क भी बढ़ जायेगा. ग्रामीण इलाकों में सेवा देने से भी ये बैंक परहेज करेंगे. सरकारी योजनाओं को लागू करने से भी इन्हें गुरेज होगा|.

अभी भी देश का एक तबका निजीकरण को हर मर्ज की दवा समझता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. कई निजी बैंक डूब चुके हैं. ताजा मामला यस बैंक और पीएमसी का है|

                                         राकेश दुबे

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