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Wednesday, October 7, 2020

कोई तो रोको, इस हैवानियत को


 


रेवांचल टाइम्स - ये कैसी हैवानियत पसर रही है, हाथरस के बाद बलरामपुर, आजमगढ़, बुलंदशहर, राजस्थान के बारां, मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में जो घट रहा है वो किसी सम्प्रदाय के खिलाफ नहीं बल्कि आधी इंसानी नस्ल के खिलाफ है | हैवानियत की यह हवा कौन चला  रहा है | माँ, बेटी और बहिन के बारे में सोच कर सर चकरा रहा है |महिलाओं की सुरक्षा का विषय एक बार फिर हमें झकझोर कर न सिर्फ सोचने पर मजबूर, बल्कि शर्मिंदा भी कर रहा है। तकलीफ इस बात की है जिस जघन्य अपराध से हमारी मानव सभ्यता को सबसे पहले दामन छुड़ा लेना चाहिए था, उसी अपराध को हमारे बीच कई लोग ऐसे अंजाम देते हैं कि इंसानियत पर भी शक होने लगता है। हाथरस और अन्य जगह एक सीरिज में हुई हैवानियत ने देश की सज्जन शक्ति के बौनेपन को उजागर किया है | यह बात और ज्यादा शर्मशार करने वाली है, इस हैवानियत को रोकने की जगह राजनीति इसे हवा दे रही है | देश की सज्जन शक्ति ये लिए ये घटनाएँ न केवल चुनौती है, बल्कि खतरे का संकेत है | सबसे पहले उस इंसानी बिरादरी के बारे में कुछ करो, जिससे ये लैंगिक गैर बराबरी  समान  हो | सिर्फ किताबों में नारी की पूजा, कदमों के नीचे जन्नत के मुहावरों से बाहर आओ और उन पंजों को मरोड़ दो जो आपकी नहीं किसी की भी बहिन बेटी की और गलत इरादों से  बढ़ रहे हैं | यह घिनौनी हैवानियत दिनों दिन बढ़ती जा रही है। आम जन में रोष है, यह इशारा है कि कानून-व्यवस्था से लोग संतुष्ट नहीं हैं। सब उठो और मिलकर खड़े हो जाओ, ये सबकी बात है |

हाथरस के बाद देश में कई जगह मानवता शर्मसार हुई है। इस देश के सजग और विधि-प्रिय नागरिक जितने विचलित हैं, क्या हमारी व्यवस्थाएं भी उतनी ही चिंतित हैं? शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा, जहां ऐसी घटनाओं पर पुलिस लीपापोती करने की कोशिश न कर रही हो। उत्तर प्रदेश में अगर इनकार की मुद्रा है, तो  मध्यपदेश और राजस्थान में भी वही ढर्रा है। व्यवस्था की टालमटोल, लापरवाही, उदासीनता का ही नतीजा है कि निर्भया काल की राष्ट्रीय शर्म के बाद भी भारतीय समाज में बलात्कार की घटनाएं बढ़ती चली जा रही हैं। निर्भया  काल के समय देश में भावनाओं में उबाल आया था और ऐसा लगा कि हम सुधार की दिशा में बढ़ेंगे। इसके विपरीत आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्ष में महिलाओं के शोषण की आशंका में ४४ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पिछले वर्ष ३२०३३ बलात्कार हुए थे, जिसमें से करीब ११ प्रतिशत मामले तो दलित महिलाओं से जुड़े थे।

 

आज की चेतावनी कह रही है |बड़ी-बड़ी बातों का समय बीत चुका है, अब बड़ी कार्रवाई की जरूरत है। आज यौन अपराधों और यौन हिंसा के विषय को पूरी गंभीरता से संज्ञान में लेने की जरूरत है। किसी दुर्घटना के बाद अलम उठाने वाले हमारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर पूरी ईमानदारी से ध्यान देते, तो देश में बलात्कार के मामले कम से कम हो रहे होते, उनका भरोसा करना बेकार है । उनका उद्देश्य समाज सुधार न कभी था और न है| निर्भया के समय जो कानून बने थे, कानून में जो सुधार हुए थे, उन्हें लोग भूल चुके हैं, हमारी व्यवस्थाएं  तो उनका मखौल बना रही  हैं?

अपने दिल पर हाथ रख कर कहिये , क्या यह एक ऐसा अपराध नहीं है, जिसके  खिलाफ देश की सज्जन शक्ति को खड़ा होना चाहिए  । पीड़ित के साथ पूरी व्यवस्था को अपनी पूरी ममता और मरहम के साथ खड़ा होना चाहिए और उत्पीड़क के प्रति  रहम की सारी अपील दलील  को अनसुनी कर देना  चाहिए।  वैसे भी किसी सभ्य समाज के सामाजिक, धार्मिक,  और वैधानिक  आधार में  कोई तर्क ऐसा नहीं, जिससे किसी बलात्कारी को किसी आड़ में पल भर के लिए भी बचाया जा सके। 

ध्यान दीजिये सज्जन शक्ति का  रोष  चरम की ओर बढ़ रहा है, यह इशारा है कि कानून-व्यवस्था से लोग संतुष्ट नहीं हैं। समाज को पूरी कड़ाई से अपने व्यवहार को परखना होगा और राजनेताओं को अपने दायरे अपराध मोह से पृथक रखना होगा, वे कम से कम  कानून-व्यवस्था के मामले में राजनीति न करें इससे बढ़कर वर्तमान में कोई राष्ट्र सेवा नहीं है  ।

                                           राकेश दुबे

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