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Monday, August 17, 2020

स्वदेशी रक्षा उत्पाद और उससे जुड़े जरूरी सवाल


रेवांचल टाइम्स डेस्क - रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों 101 रक्षा उत्पादों के आयात को प्रतिबंधित करने का जो फैसला किया, उसकी सराहना हो रही है। होनी भी चाहिए ,यह एक बहुप्रतीक्षित मांग को पूरा करने की ओर सरकार द्वारा की गई समयोचित कार्यवाही है | इससे देश को एक बड़ा फायदा यह होगा कि जरूरत के वक्त हमें किसी दूसरे देश के आगे हाथ नहीं फैलाने होंगे। यह एक सार्वभौम सत्य है कि कोई देश किसी अन्य देश को कभी समग्र रक्षा तकनीक नहीं सौंपता है। अत्याधुनिक लड़ाकू विमान राफेल की खरीद में भी ऐसी ही शर्तें हैं। जरा याद कीजिये 1999 | जब कारगिल युद्ध के समय लेजर गाइडेड बम इजरायल से रातोंरात मंगाएं गये थे | स्वदेशी तकनीक आज की हर देश की सबसे बड़ी ताकत है |खास कर जब आपके पडौसी आपके शुभचिंतक  न हो और उनके यानि पाकिस्तान और चीन जैसे देशों का रक्षा बजट हमसे ज्यादा हो |

     
भारत के अपने सैन्य उत्पाद हमेशा मानकों पर खरे उतरे हैं। तभी तो दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम इतनी मिसाइलें बनाई और देश पोखरण में अपने परमाणु बमों का सफल परीक्षण कर सका। हिन्दुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट बन चुके है, जो वायु सेना ने मानकों को पूरा  करते है। 155 एमएम गन अब हम खुद बनाने लगे हैं। कुल मिलकर हमारे पास क्षमता है, बस इच्छा-शक्ति की कमी है। सही मायने में स्वेदशीकरण के प्रयास पहले किए गए होते, आज सैन्य खरीद में हमारी निर्भरता दूसरे देशों पर इतनी ज्यादा नहीं होती, बल्कि हम कुछ और आगे करते । अभी तो आलम यह है कि अब तक हम अपनी राष्ट्रीय कार्ययोजना तक नहीं बना सके हैं। हम यह तय ही नहीं कर पाए हैं कि रक्षा मामलों को लेकर विश्व में हम अपना कौन सा मुकाम बनाना चाहते हैं?

     रक्षा-क्षेत्र में घरेलू निर्माण और खरीद की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि हमारे देश में हथियारों की खरीद-प्रक्रिया बहुत पारदर्शी नहीं मानी जाती। इस प्रक्रिया में सबसे पहले सेना अपनी जरूरतें रक्षा मंत्रालय को बताती है, फिर मंत्रालय आबंटित बजट के अनुसार सैन्य-सामग्रियों की खरीद करता है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि खरीद में जिस तरह से बिचौलिए हावी रहते हैं, उससे कई तरह की अडचने पैदा होती हैं। एजेंट जो नमूना हथियार भेजता है, उसका इस्तेमाल करके यह तय किया जाता है कि उसकी कितनी जरूरत है। अधिकारीगण उसका उपयोग करके उसे स्वीकृत करते हैं या फिर खारिज। ऐसे कई उदहारण है जिस हथियार को सेना ने  मना कर दिया, उसे भी किसी न किसी तरीके से बिचौलिए ने खरीदी के लिए स्वीकृत करवा लिया। स्वदेशी खरीद में ऐसा संभव नहीं हो सकेगा। इससे न सिर्फ बिचौलिए की संस्कृति खत्म हो सकेगी, बल्कि देश का पैसा देश में ही रहेगा, जिसका अन्य इस्तेमाल हो सकेगा।

        आज रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को लेकरकई बड़े उद्ध्योग जैसे  टाटा बजाज आदि औद्योगिक समूह शस्त्र विकास को लेकर खासे इच्छुक हैं। सरकार चाहे, तो निजी क्षेत्र को मौका देकर अपनी रक्षा जरूरतें पूरी कर सकती है। हालांकि, इसमें एक मुश्किल यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद हमारा रक्षा बजट काफी कम है। अभी हम अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 2.4 प्रतिशत रक्षा मद में खर्च करते हैं, जबकि पाकिस्तान और चीन जैसे देशों का रक्षा बजट हमसे ज्यादा है। आज जरूरत सैन्य खरीद में पसरी अफसरशाही को भी कुंद करने की है। अभी होता यह है कि सैन्य अधिकारी सेवानिवृत्त होने के बाद रक्षा-खरीद में शामिल हो जाते हैं, जो एक गलत परंपरा है, खासतौर से उस देश के लिए, जिसकी फौज संख्या-बल में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी ताकत है।
                                          रेवांचल टाइम्स

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