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Thursday, August 27, 2020

मानव, मशीन और बेरोजगारी में संतुलन की जरूरत



रेवांचल टाइम्स डेस्क - विश्व बैंक ने इंडिया डेवलपमेंट अपडेट में भारत को सलाह दी है कि सरकार अपने श्रमिकों की उत्पादकता और निर्यात बढ़ाने का प्रयास करे। उत्पादकता का अर्थ यह हुआ कि प्रति व्यक्ति माल का उत्पादन अधिक हो। जैसे कृषि मजदूर और ट्रैक्टर चालक की उत्पादकता की तुलना करें,तो ट्रैक्टर चालक कृषि मजदूर की तुलना एक दिन में अधिक भूमि की जुताई करता है। विश्व बैंक का कहना है कि जब उत्पादकता बढ़ेगी तो हमारा माल सस्ता होगा। उत्पादन लागत कम होने से हम अपने माल का विश्व बाजार में निर्यात कर सकेंगे और हम कोविड के संकट से निकल जायेंगे।
          श्रम की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए हमें पूंजी तथा मशीनों का उपयोग अधिक करना पड़ता है। यदि ट्रैक्टर जैसी मशीनों के उपयोग से श्रम की उत्पादकता बढ़ाई गयी तो निश्चित रूप से माल सस्ता बनेगा, परन्तु श्रम का उपयोग घटेगा, रोजगार घटेगा और बेरोजगारी बढ़ेगी। देश में यदि डीजल का उपयोग बंद हो जाये और सभी ट्रैक्टर काम करना बंद कर दें तो जुताई के लिए वर्तमान की तुलना में लगभग 10 गुना रोजगार बैलों से जुताई करने में उत्पन्न हो जायेंगे। साथ-साथ गेहूं का दाम भी बढ़ जायेगा। अर्थात यदि हम मशीन जैसे ट्रेक्टर से खेती करते हैं तो उसके प्रभाव स्वरूप एक पूंजी अधिक लगती है दो श्रमिक बेरोजगार होता है। इन दोनों प्रभावों का मिलाजुला परिणाम यह होता है कि माल सस्ता हो जाता है। अर्थ यह कि बेरोजगारी दूर करने के लिए महंगे माल को स्वीकार करना होगा
कोरोना संकट से पहले बेरोजगारी देश-दुनिया के लिये चुनौती नहीं थी ऐसा नहीं है, लेकिन विश्वव्यापी महामारी के प्रकोप ने इस संकट को भयावह बना दिया है। बड़ी विडंबना यह है कि इस संकट की मार उस तबके पर पड़ी जो श्रम सघन कामों में लगा था। खासकर देश के असंगठित क्षेत्र में नौकरियों पर चोट पड़ी। ज्यादा रोजगार निजी क्षेत्र में उन लोगों का गया, जो अनुबंध, अस्थायी तौर पर अथवा ठेके पर काम कर रहे थे। ऐसे वक्त में जब दुनिया की आधी आबादी लॉकडाउन के दायरे में आ गई तो बेरोजगारी के भयावह संकट का अक्स उभरकर सामने आना स्वाभाविक था।
           ऐसा पहली बार हुआ कि दुनिया में हवाई, समुद्री व सड़क यातायात बंद होने से टूरिज्म से लेकर तमाम कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन लंबे अरसे से कोविड संकट से रोजगार को हुए नुकसान का आकलन लगा रहा है। तमाम एजेंसियां अपने स्तर पर बेरोजगारी के आंकड़े दे रही हैं। कहना मुश्किल है कि ठीक-ठीक कितने लोगों की नौकरियां गई हैं।
हाल ही में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकनॉमी यानी सीएमआईई ने बताया कि जुलाई महीने में करीब 50 लाख लोगों की नौकरी गई। इसकी वजह से कोरोना महामारी और लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने वालों की संख्या 1.89 करोड़ तक पहुंच गई है। यद्यपि जून में अनलॉक की प्रक्रिया आरंभ होने के बाद कुछ नौकरियां बहाल होती नजर आईं लेकिन स्थानीय स्तर पर कंटेनमेंट जोन में लगने वाले लॉकडाउन की वजह से भी जुलाई में रोजगार में फिर गिरावट दिखी। दरअसल अप्रैल माह में संक्रमण रोकने के मकसद से लगाये लॉकडाउन के कारण  सर्वाधिक 1.77 करोड़ लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा। मई में एक लाख लोगों के रोजगार गये। फिर जून में 39 लाख लोगों को रोजगार मिला, लेकिन जुलाई में पचास लाख लोगों की नौकरी गई, जिससे नौकरी गंवाने वालों की संख्या 1.89 करोड़ तक जा पहुंची। निस्संदेह इसमें रोज कमाकर खाने वालों का आंकड़ा जुड़ेगा तो यह संख्या काफी बड़ी हो सकती है।
भारत में जो इक्कीस फीसदी नौकरीपेशा लोग हैं, वे कोरोना संकट के बाद किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए हैं। अभी कहना जल्दबाजी होगी कि कब तक स्थिति सामान्य होगी। जब यह सवाल कृषि क्षेत्र में खड़ा होता है तो वहां यह आकलन और ज्यादा कठिन होगा | मशीन बनाम मानव और बेरोजगारी के आंकड़ों के बीच संतुलन बैठना एक चुनौती है |
                                              राकेश दुबे

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