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Tuesday, 7 July 2020

विरोध की हद समझिये

रेवांचल टाइम्स डेस्क - प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी की नियंत्रण रेखा की यात्रा को संभावित युद्ध का संकेत मान रहे हैं। वैसा हो अथवा न हो पर इस यात्रा से निश्चय ही उन सैनिकों को हौसला बड़ा होगा, जो बेहद प्रतिकूल और जटिल परिस्थितियों में भी देश की सीमाओं की रक्षा के लिए दुर्गम स्थानों पर दिन-रात डटे रहते हैं।गत 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सैनिकों से हिंसक भिड़ंत और उसमें 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद बने माहौल में बढ़ता तनाव हर कोई महसूस कर रहा है।सबको मालूम है, चीन ने एक बार फिर अपने विश्वासघाती चरित्र का ही परिचय दिया था, अतीत से सबक लिए बिना बार-बार विश्वासघाती पर विश्वास करना  समझदारी नहीं कहा जा सकता | अभूतपूर्व कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण  इस मुद्दे पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई सर्वदलीय बैठक में गोपनीयता समेत तमाम कारणों से सरकार की अपनी सीमाएं रही होंगी। पहले सभी दलों ने इस मुद्दे पर एकजुटता का ही संदेश दिया बाद में अलग-अलग राजनीतिक राग आलापने में भी देर नहीं लगी।

       वैसे राजनीति बुरी बात नहीं है। सवाल पूछना तो लोकतंत्र का बुनियादी अधिकार है, लेकिन हर चीज का समय और सीमा होती है। अगर कोरोना से लेकर गलवान घाटी तक हर मुद्दे पर आलोचना का मकसद सिर्फ केंद्र सरकार या और स्पष्ट शब्दों में कहें तो प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा करना रह जायेगा, तब वह प्रासंगिकता खो कर खीझ से उपजा अनर्गल प्रलाप भर रह जायेगा, जबकि यह समय राजनीति का नहीं, राष्ट्रनीति का है। मोदी सरकार और भाजपा भले कहे कि लॉकडाउन समेत समय पर उठाये गये कदमों से कोरोना संक्रमण नियंत्रित करने में मदद मिली, पर संक्रमितों के आंकड़ों में आये दिन की उछाल का सच तो नहीं छिप सकता। जाहिर है, संभावित परिस्थितियों के आकलन और उनसे निपटने की रणनीति बनाने में सरकार से चूक हुई है, पर यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक से कब क्या चूक हुई, उसकी जिम्मेदारी-जवाबदेही की बहस बाद में भी हो सकती है।कोरोना से संक्रमित भारत अकेला देश नहीं है कोरोना और सीमा संकट विषय में कोई साम्य नहीं है ।
कोरोना के आकलन और निपटने की तैयारी  में अन्य देशों की सरकारों से भी चूक हुई होगी, पर क्या वहां कहीं भी दलगत राजनीति से प्रेरित आरोप-प्रत्यारोप का शर्मनाक खेल दिखा? कोरोना किसी भी सरकार की विफलता का परिणाम नहीं है। हां, उससे निपटने की रणनीतियों में विफलता की जिम्मेदारी-जवाबदेही अवश्य सरकारों की होती है। परन्तु सिर्फ सरकारों की ही नहीं यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार के भरोसे भी नहीं छोड़ी जा सकती।
वैसे कोरोना हो या गलवान, दोनों ही संकट चीन के धूर्त और विश्वासघाती चरित्र की ही देन हैं। समाजवादी पृष्ठभूमि के राजनेता और विचारक समय-समय पर केंद्र सरकार को चीन के नापाक मंसूबों के प्रति आगाह भी करते रहे, लेकिन लंबे अंतराल के बाद टास्क फोर्स और विशेष प्रतिनिधि स्तर पर शुरू हुई सीमा वार्ता वजह रही हो या फिर चीन द्वारा बनायी गयी अपनी विश्व महाशक्ति की छवि हर केंद्र सरकार भारतीय सीमा क्षेत्र में चीनी घुसपैठ की हरकतों को नजरअंदाज कर तूल देने से परहेज करती रही।

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