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Thursday, June 25, 2020

दुष्काल : अपनी साख बढ़ाएं और हीनता का भाव दूर करें

रेवांचल टाइम्स - हम भारतीयों ने अपनी विश्वसनीयता अपनी ही नजरों में इतनी कम कर रखी है कि सहज विश्वास करना मुश्किल है | कोविड -19 के लिए खोजी गई  एलोपेथिक और आयुर्वेदिक दवाओं के साथ ऐसा ही हो रहा है | किसी भी विषय पर सहज विश्वास की पहली सीढ़ी साख और आत्मविश्वास  होती है| भारत में अब भी किसी भी बात के प्रमाणीकरण के लिए विदेशी प्रमाणपत्र की अनिवार्यता है | यह हमारे स्वदेशी स्वभाव के विरुद्ध है | हमारे अंतर्मन में बैठे हीनता के संस्कार इससे उबरने नहीं दे रहे | सबको कुछ करना होगा | अभी तो कोरोना जीवन के साथ ही जीविका को भी ग्रस रहा है| देश के नीति-निर्माताओं के सामने दो चुनौतियाँ हैं | पहली कोरोना को जिंदगी लीलने से रोकना और दूसरी  रोजी-रोटी बरकरार रखना | दूसरी चुनौती शायद ज्यादा बड़ी होती जा रही है|

एक निश्चित ढर्रे पर चलती अर्थव्यवस्था के ट्रायल एंड एरर की प्रक्रिया से निकले सारे निदान और उपाय अब चूकने लगे हैं| श्रम, उत्पादन और बाजार के आधार नगरों को महामार्गों से जोड़ती अर्थव्यवस्था की कड़ियां अब टूटती दिख रही  हैं| इसलिए अब अब विदेशी अर्थ चिन्तन को ताक पर उपयोगिता आधारित स्वदेशी अर्थव्यवस्था के माध्यम से रोजगार, विकास और समृद्धि के नये सपनों को पूरा करने में जुटना होगा |
यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि देश का  हर गांव अर्थव्यवस्था की वैकल्पिक धुरी बनने की क्षमता रखता है| जिसके लिए न तो निवेश की जरूरत है और न ही बाजार खोजना है| जंगलों के फल, फूल, पंखुड़ियों, पत्तों, जड़ों और छालों के राज जानकर प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाये पहचानने, मांगने और उपयोग की जरूरत है|

मान जाईये यह कदम भारी खर्च पर आनेवाले बाहरी उत्पादों की जरूरत कम कर बचत करने के साथ स्थानीय खपत का बाजार भी विकसित करेगा| आवश्यकता पूरी ईमानदारी की है जिससे आपकी साख देश और विदेश में फिर स्थापित हो | यह कदम  प्राकृतिक जीवन पद्धति की ओर अग्रसर हो रही दुनिया के लिए संसाधन का बड़ा स्रोत भी विकसित करेगा|

        कोरोना संक्रमण के इस संकट काल में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की भी खूब चर्चा हो रही है| इसके लिए तो हमारे जंगलों और गांव से बड़ा संसाधन केंद्र अन्यत्र नहीं हो सकता है| आयुर्वेद के विकास के जरिये भी इस अवसर को राष्ट्र हित में उठाने की जरूरत है| इससे एक ओर जहां रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास कर स्वास्थ्य पर होने वाले भारी-भरकम खर्च को कम किया जा सकता है, वहीं गांवों में कमाई के अवसर भी बढ़ाये जा सकते हैं. गांवों और जंगलों में औषधि उत्पादन के बड़े केंद्र बनने की पूरी क्षमता है|
ऐसे सैकड़ों पौधे हैं, जो गांवों को औषधि और स्वादिष्ट भोजन तैयार करने में मदद करते हैं|
इसके लिए जड़ी-बूटी वाले इलाकों में औषधि उत्पादन के क्लस्टर स्थापित करने की जरूरत है| इससे जनजातीय समुदाय और स्थानीय ग्रामीणों की आर्थिक हालत में भी सुधार होगा | साथ ही, बंजर जमीन को भी उपजाऊ बनाया जा सकेगा | विकेंद्रित अर्थव्यवस्था की राह यहीं से तैयार होगी, जो फिर कभी कोरोना वायरस जैसी किसी आपदा के आने पर  माइग्रेशन और रिवर्स माइग्रेशन जैसा संकट पैदा नहीं करेगा| दुनियाभर में भोजन, वस्त्र और औषधि के लिए जैविक उत्पादों की बढ़ रही मांगों को पूरा करने में  आज भी हमारे गांव सक्षम हैं|
ये गाँव देश की निर्यात क्षमता बढ़ाने में भी ये मील के पत्थर की भूमिका निभा सकते हैं| जरूरत इस बात कि है कि जंगल और गांव की ताकत को सरकार पहचान कर इसके अनुरूप आर्थिक ढांचा तैयार करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाये| सबसे बड़ी बात यह है कि ये तमाम उपक्रम जंगलों में हो सकते हैं, इनसे वनों को कोई नुकसान भी नहीं है क्योंकि इनमें से बहुत सारे पौधे ऐसे हैं, जिनका उत्पादन बड़े वृक्षों के छाया तले होता है|

हमारी आनेवाली पीढ़ी इनके जरिये सेहत और संपदा दोनों प्राप्त कर सकती है. कम लागत में तैयार होनेवाले उत्पाद हमारे बाजार को भी मजबूती देंगे |आत्मनिर्भर भारत का रास्ता भी तो  यहीं से होकर गुजरता है| लेकिन, इससे पहले अपनी साख और आपसी विश्वास को मजबूत करें |
                                          राकेश दुबे

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